भोपाल/आई संवाद/ मध्यप्रदेश में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि इस बार विस्तार का मकसद केवल नए नेताओं को मौका देना नहीं होगा, बल्कि उन क्षेत्रों की नाराजगी दूर करना भी होगा जो सरकार गठन के बाद से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की शिकायत करते रहे हैं। ऐसे में क्षेत्रीय संतुलन का मुद्दा सरकार के लिए अहम साबित हो सकता है।
नर्मदापुरम संभाग उपेक्षित
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार में कुछ संभागों की भागीदारी को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। विशेष रूप से नर्मदापुरम संभाग को लेकर असंतोष सामने आता रहा है, क्योंकि यहां से अब तक मंत्रिमंडल में किसी भी जनप्रतिनिधि को जगह नहीं मिली है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि संभावित विस्तार में इस क्षेत्र को प्राथमिकता दी जा सकती है।
जबलपुर और रीवा संभाग की भी निगाहें विस्तार पर
नौ जिलों वाले जबलपुर संभाग को भी अपेक्षा के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिलने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। वहीं रीवा संभाग में उपमुख्यमंत्री सहित तीन मंत्री जरूर हैं, लेकिन उनमें से दो राज्य मंत्री स्तर के हैं। ऐसे में वहां भी अधिक प्रभावी भागीदारी की मांग समय-समय पर उठती रही है।
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सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर रहेगा फोकस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विस्तार में केवल क्षेत्रीय संतुलन ही नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को भी साधने का प्रयास होगा। आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, महिला प्रतिनिधित्व और विभिन्न क्षेत्रों की भागीदारी जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जा सकता है। सरकार के सामने चुनौती यह भी होगी कि नए चेहरों को अवसर देते हुए मौजूदा राजनीतिक संतुलन प्रभावित न हो।
भोपाल संभाग को मिला सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व
वर्तमान मंत्रिमंडल में भोपाल संभाग की स्थिति सबसे मजबूत मानी जाती है। पांच जिलों वाले इस संभाग से छह मंत्री सरकार का हिस्सा हैं। भोपाल, सीहोर, रायसेन और राजगढ़ जिलों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है। विशेष रूप से राजगढ़ जिले से दो राज्य मंत्रियों की मौजूदगी क्षेत्रीय असंतुलन की बहस को और हवा देती है।
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केंद्र में मिला कुछ क्षेत्रों को महत्व
राज्य मंत्रिमंडल में कुछ संभागों की हिस्सेदारी सीमित है, लेकिन केंद्र सरकार में उन्हें प्रतिनिधित्व प्राप्त है। विदिशा से सांसद और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, गुना से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा बैतूल-हरदा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले डीडी उइके केंद्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।
2028 की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा विस्तार
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लंबे समय तक किसी क्षेत्र को सत्ता में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिलने से संगठन और कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ सकता है। नर्मदापुरम संभाग को इसका प्रमुख उदाहरण माना जा रहा है। ऐसे में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी और भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने के लिए किन नेताओं पर भरोसा जताती है।
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