Police Investigation Controversy

भोपाल के मिसरोद थाने में ‘फिक्स गवाहों’ का खेल?… आरटीआई में हुआ खुलासा!

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भोपाल/आई संवाद/ राजधानी भोपाल के मिसरोद थाना क्षेत्र में दर्ज आपराधिक मामलों की जांच और कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त दस्तावेजों और पुलिस के क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग एंड नेटवर्क सिस्टम (सीसीटीएनएस) के आंकड़ों से पता चला है कि चाय-समोसे बेचने वाले, ढाबा संचालक, मजदूर और यहां तक कि थाने के ड्राइवर को भी दर्जनों मामलों में गवाह बनाया गया है। जानकारी के अनुसार थाना प्रभारी रतन सिंह परिहार के 2 दिसंबर 2025 को पदभार ग्रहण करने से लेकर 16 अप्रैल 2026 तक मात्र चार माह की अवधि में कुल 146 मामले दर्ज किए गए। इनमें 109 प्रकरण सार्वजनिक स्थान पर शराब पीने, 15 वाहन चोरी, 14 घरों में चोरी तथा 8 अवैध शराब बिक्री से जुड़े हैं।

एक ही चेहरे, कई मामलों के गवाह
दर्ज एफआईआर के विश्लेषण में सामने आया कि थाने से जुड़े या आसपास रहने वाले कुछ लोगों को बार-बार गवाह बनाया गया। मिसरोद थाने का वाहन चालक सुरेश अहिरवार 22 मामलों में गवाह बना, जबकि 11 मील क्षेत्र में ढाबा संचालित करने वाले विष्णु पाटिल उर्फ देवा पाटिल को 36 मामलों में गवाह दर्शाया गया। मजदूर राघवेंद्र मैना 12 मामलों में और थाने के पास चाय-समोसे की दुकान चलाने वाले धर्मेंद्र कुशवाहा तीन मामलों में गवाह बने। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अलग-अलग स्थानों और समय पर हुई घटनाओं में बार-बार वही व्यक्ति पुलिस को गवाह के रूप में कैसे मिल गए।

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आरोपी बना गवाह, गवाह बना आरोपी
दस्तावेजों में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां एक ही व्यक्ति को अलग-अलग एफआईआर में कभी आरोपी तो कभी गवाह बना दिया गया। 13 दिसंबर 2025 को दर्ज एक मामले में भगवान दास अहिरवार को गवाह बनाया गया, जबकि उसी दिन दूसरे प्रकरण में उसे आरोपी दर्शाया गया। इसी तरह दिलीप कुमार को एक मामले में आरोपी और दूसरे में गवाह बनाया गया। 15 दिसंबर को दर्ज दो अलग-अलग मामलों में सतीश शर्मा और संतोष मोरे की भूमिकाएं भी आपस में बदलती दिखाई दीं। एक मामले में जो आरोपी था, दूसरे में वही गवाह बन गया और गवाह आरोपी।

पुलिसकर्मी भी बने गवाह
जांच में यह भी सामने आया कि 28 मामलों में पुलिस विभाग के आरक्षक, प्रधान आरक्षक, सहायक उपनिरीक्षक और उपनिरीक्षक स्तर के कर्मचारी स्वयं गवाह बने हुए हैं। इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष गवाहों की उपलब्धता तथा जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

ढाबा संचालक और ड्राइवर की भूमिका पर सवाल
मिसरोद क्षेत्र के देवराज ढाबा संचालक विष्णु पाटिल को 36 मामलों में गवाह बनाए जाने से यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वह हर घटना स्थल पर मौजूद था या फिर उसे नियमित रूप से पुलिस गवाह के तौर पर इस्तेमाल किया गया। इसी तरह थाने के ड्राइवर सुरेश अहिरवार की 22 मामलों में गवाही दर्ज होना भी सवालों के घेरे में है। रिकॉर्ड के अनुसार एक ही दिन में 10 अलग-अलग मामलों में उसकी गवाही दर्ज की गई।

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मजदूर और दुकानदार भी बने नियमित गवाह
मजदूरी करने वाले राघवेंद्र मैना को 12 मामलों में गवाह बनाया गया, जबकि चाय-समोसे की दुकान चलाने वाले धर्मेंद्र कुशवाहा को भी अलग-अलग मामलों में गवाह के रूप में शामिल किया गया। इसके अलावा अन्य मजदूरों को भी एक ही दिन में कई मामलों में गवाह बनाए जाने के तथ्य सामने आए हैं।

उठ रहे हैं कई सवाल
इन खुलासों के बाद पुलिस की विवेचना प्रक्रिया, स्वतंत्र गवाहों की उपलब्धता और मामलों की निष्पक्षता को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। यदि एक ही व्यक्ति बार-बार विभिन्न मामलों में गवाह बन रहा है, तो यह जांच की विश्वसनीयता और न्यायिक प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस मामले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी क्या जांच कराते हैं और इन आरोपों पर पुलिस विभाग का आधिकारिक पक्ष क्या सामने आता है।

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