सावन का महीना भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दौरान देशभर से लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल कांवड़ यात्रा करते हैं और अपने-अपने क्षेत्र के शिवालयों में पहुंचकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम, अनुशासन और कठिन तपस्या का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए पहली बार यात्रा पर निकलने वाले श्रद्धालुओं के लिए इसके नियमों और मर्यादाओं की जानकारी होना बेहद आवश्यक है।
कांवड़ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि कांवड़ को कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाता। विश्राम की आवश्यकता होने पर कांवड़ को विशेष स्टैंड, पेड़ की मजबूत शाखा या किसी साथी कांवड़िये के हाथ में रखा जाता है। मान्यता है कि यदि कांवड़ भूमि को स्पर्श कर ले तो उसकी पवित्रता भंग हो जाती है और श्रद्धालु को दोबारा स्नान कर नया गंगाजल भरना पड़ता है।
यात्रा के दौरान शारीरिक और मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। स्नान के बाद ही कांवड़ को स्पर्श करने की परंपरा है। चमड़े से बनी बेल्ट, पर्स, जूते-चप्पल जैसी वस्तुओं का उपयोग नहीं किया जाता। साथ ही क्रोध, अपशब्द, विवाद और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर पूरी यात्रा भगवान शिव के स्मरण में पूरी की जाती है।
कांवड़ यात्रा में मांसाहार, शराब, सिगरेट, तंबाकू और किसी भी प्रकार के नशे का सेवन पूरी तरह निषिद्ध माना जाता है। श्रद्धालु केवल सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और अधिकांश कांवड़िये लहसुन-प्याज से बने भोजन से भी परहेज करते हैं। यात्रा के दौरान कांवड़ को हमेशा कंधे पर ही रखा जाता है। इसे सिर के ऊपर से ले जाना या किसी व्यक्ति के पीछे से निकालना भी धार्मिक मर्यादाओं के विरुद्ध माना जाता है। कांवड़ को साफ-सुथरे वस्त्र, फूल और घंटियों से सजाया जाता है तथा उसमें भरे गंगाजल को अत्यंत पवित्र मानते हुए उसमें हाथ या उंगली नहीं डाली जाती।
पहली बार यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को हल्के सूती, आरामदायक और सामान्यतः भगवा रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। यदि परंपरा के अनुसार नंगे पैर चलना संभव न हो तो स्वास्थ्य की दृष्टि से हल्की और मुलायम चप्पलों का उपयोग किया जा सकता है। पैरों की सुरक्षा के लिए फर्स्ट एड किट, जरूरी दवाइयां, टॉर्च, रेनकोट या छाता तथा वाटरप्रूफ बैग साथ रखना उपयोगी रहता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार पूरी यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को अनुशासन बनाए रखते हुए निर्धारित कांवड़ मार्ग का ही उपयोग करना चाहिए। प्रशासन के निर्देशों का पालन करना, यातायात नियमों का सम्मान करना और “बम-बम भोले” तथा “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ यात्रा पूरी करना कांवड़ परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। आस्था, संयम और सेवा की भावना से की गई कांवड़ यात्रा भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने का माध्यम मानी जाती है।









