इंदौर/आई संवाद/ एक तरफ इंदौर शहर में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है, जल स्तर सैकड़ों फीट नीचे चला गया है, वहीं एक चमत्कार ने आध्यात्मिक शक्ति की बात को फिर से सिद्ध कर दिया। शहर के ही राजकुमार मिल के पास स्थित शीलनाथ बाबा के मंदिर में मात्र 5 से 8 फीट पर ही पानी ही पानी है। इस स्थान को लेकर मान्यता है कि क्षिप्रा नदी में जल स्तर घटने बढ़ने पर इस स्थान पर भी जल स्तर घटता बढ़ता रहता है। वहीं अब लोग इसे बाबा की आध्यात्मिक शक्ति का परिणाम मान रहे हैं।
शीलनाथ महाराज ने की थी तपस्या
राजकुमार मिल के तालाब के सामने स्थित शीलनाथ महाराज का मंदिर है। यहां पर बाबा तपस्या किया करते थे। इस मंदिर के सामने ही शिवलिंग स्थापित है, जोकि अक्सर पानी में ही डूबा रहता है। अंदर जाने के लिए सीढ़ियों के जरिए पूजा और आरती की जाती है। वहीं जमीन से यह मंदिर और कुंड करीब 12 फीट नीचे बताया गया है। कभी-कभी कुंड का पानी ऊपर तक आ जाता है। वर्तमान में इस जलस्तर के दर्शन करने के लिए लोग यहां पर आ रहे हैं। वहीं कुछ दिन पहले करीब के मंदिर में बोरिंग कराया गया था, जहां पर करीब 250 फीट पर पानी निकला था।
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क्षिप्रा का जल आने का इतिहास
शीलनाथ महाराज तपस्या करने के साथ रोजाना क्षिप्रा के जल से ही स्नान किया करते थे। एक बार उनका स्वास्थ्य बिगड़ने पर वे स्नान करने नहीं जा पाए, तो मां क्षिप्रा ने उन्हें यहीं पर कुंड के रुप में दर्शन दिए। उस समय महाराज के आहवान करने मां क्षिप्रा खुद प्रकट हुई। तब से आज तक कुंड का पानी नहीं सूखा है। यहां पर बाबा की अखंड ज्योत भी सालों से जल रही है। जिसके दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।
शीलनाथ बाबा का इतिहास
योगेंद्र शीलनाथ महाराज का संबंध मध्य प्रदेश के देवास क्षेत्र से है। वे देवास जूनियर रियासत के कुलगुरु माने जाते हैं। कहा जाता है कि शीलनाथ बाबा जयपुर के क्षत्रिय घराने से थे। 1839 में दीक्षा प्राप्ति के बाद बाबा ने उत्तराखंड के जंगलों में कठिन तप किया। जिसके बाद पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस, चीन, तिब्बत और कैलाश मानसरोवर होते हुए वे पुन: भारत पधारे। उन्होंने देवास में रहने की बजाय इंदौर में तपस्या करने की बात कही, तब देवास रियासत ने होलकर स्टेट से बात करके महाराज को 300 एकड़ भूमि दिलाई, लेकिन बाद में सेठ हुकुमचंद के आग्रह पर उन्होंने मिल के लिए जमीन दान कर दी। उसी के बाद पूरा इलाका मिल क्षेत्र कहलाया।
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