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यौन अपराधों की सुनवाई में संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट का जोर

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पीड़ितों की गरिमा, निजता और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखने के निर्देश; असंवेदनशील जिरह से दोबारा उत्पीड़न रोकने पर फोकस

नई दिल्ली। यौन अपराधों से जुड़े मामलों की न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 14 जुलाई 2026 को दिए फैसले में कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ितों की गरिमा, निजता और मानसिक स्थिति का ध्यान रखा जाना जरूरी है। न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता के साथ मानवीय संवेदनशीलता और सहानुभूति भी महत्वपूर्ण हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया है। रिपोर्ट में न्यायिक कार्यवाही के दौरान लैंगिक संवेदनशीलता और मानसिक आघात को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया अपनाने की सिफारिश की गई है। इसका प्रमुख उद्देश्य ऐसी जिरह और सवालों से बचना है, जिनसे पीड़ित को दोबारा मानसिक या सामाजिक उत्पीड़न का सामना करना पड़े।

दिशा-निर्देशों में पीड़ित के यौन इतिहास से जुड़े अनुचित सवालों पर निर्भरता कम करने, जांच और सुनवाई के दौरान लैंगिक पूर्वाग्रहों की पहचान करने तथा न्यायिक आदेशों में सम्मानजनक भाषा के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। साथ ही अदालतों में पीड़ित-केंद्रित और मानसिक आघात के प्रति संवेदनशील प्रक्रिया अपनाने की बात कही गई है।

रिपोर्ट में गरिमा, समानता, निजता, शारीरिक स्वायत्तता और सम्मान जैसे संवैधानिक मूल्यों को न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। इसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों और आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़े लोगों को ऐसे मामलों में अधिक संवेदनशील और सम्मानजनक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करना है।

कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में यह जानकारी दी। सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसले और ‘जजमेंट एंड जस्टिस’ नामक प्रकाशन को कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया है।