‘अमन’! तीन अक्षर का यह शब्द कितना सरल, शांत और सहिष्णु है! सुनने में मधुर, याद रखने में आसान और दिल तथा दिमाग को गहरा सुकून देने वाला। मजे की बात तो यह है कि यह शब्द जाति, धर्म और फिरकापरस्ती से भी आजाद है। यह वह शब्द है जिसे हिंदू और मुसलमान सब अपना समझते हैं। इसीलिए तो किसी का नाम ‘अमन शर्मा’ भी हो सकता है और ‘अमन खान’ भी।
हिंदू भी देश में अमन चाहता है और मुस्लिम भी अपनी दुआओं में ‘अम्न-ओ-अमान’ मांगता है। मूलतः अरबी भाषा से निकला यह शब्द ‘अमन’, जो शांति का पैरोकार है, गंगा और यमुना की ठंडी लहरों को छूकर इतना पवित्र और प्रभावी हो गया है कि हर किसी की अभिलाषा बन गया है। अब यह जितना उनका है, उतना ही हिंदी का भी। जितना मुसलमान का है, उतना ही हिंदू का भी। दरअसल अब यह एक शब्द मात्र न रहकर, हमारी साझा विरासत बन गया है। केरल से कश्मीर और कच्छ से कटक तक अब हर कोई अमन ही चाहता है, क्योंकि बिना इसके मुल्क की तरक्की हो ही नहीं सकती।
लगभग एक दशक पहले भोपाल से प्रकाशित हिंदी के दैनिक अखबार ‘समय-जगत’ के संपादकीय पृष्ठ पर “कश्मीरी युनुस इलाही और सहिष्णु भारत” के शीर्षक से मेरा एक लेख छपा था, जिसके मूल में वह कश्मीरी मुस्लिम लड़का युनुस था जो घर से ऑफिस जाते वक्त मुझे बस में मिला और भीड़ के कारण मुझसे सटकर खड़ा था। बातचीत में मालूम हुआ कि उसका नाम युनुस इलाही है, वह कश्मीर का रहने वाला है और भोपाल में रहकर पढ़ाई कर रहा है।
उसने बताया कि वह अकेला नहीं, बल्कि उसके जैसे बहुत से कश्मीरी लड़के-लड़कियां हैं, जो यहां रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। वे सब मुल्क में अमन चाहते हैं और सभी अपने सुनहरे भविष्य का सपना देख रहे हैं। युनुस और उसके साथियों को भोपाल का माहौल बहुत अच्छा लगा। यहां सब भाईचारे के साथ रहते हैं, एक-दूसरे के खुशी और गम में शामिल होते हैं और सभी अमन तथा तरक्की पसंद हैं।
आधे घंटे की इस सहज मुलाकात के बाद न तो मैं फिर कभी युनुस से ही मिल पाया, न ही किसी और कश्मीरी से, लेकिन यह सच है कि उससे हुई यह अप्रत्याशित भेंट मुझे हमेशा याद रहेगी। क्योंकि आपसी बातचीत के दौरान उसके चेहरे पर खुले आसमान में सांस लेने की खुशी और आंखों में बेहतर जीवन की तस्वीर की जो चमक मैंने महसूस की, वही मेरे देश की तरक्की की मूल बुनियाद है।
मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में स्थित मेरा कस्बा तलेन कई बार सांप्रदायिक दंगों का शिकार हुआ, लंबे समय तक माहौल में तनाव रहा, लेकिन फिर भी इस कस्बे का मूल स्वभाव शांत और सद्भाव का ही है। सभी त्योहार यहां हंसी-खुशी और भ्रातृत्व से मनाए जाते हैं। किसी प्राकृतिक आपदा और दुर्घटना के समय हिंदू-मुस्लिम सब एक-दूसरे का साथ देते हैं।
सहचर्य का यह भाव ही भाईचारे को मजबूत करता है। समाज के हर वर्ग में संवाद का सेतु निर्मित करने की बहुत जरूरत है। बातचीत करते हुए साथ-साथ चलने से कठिन रास्ता भी आसानी से कट जाता है। इसीलिए जरूरत इस बात की है कि यदि दोस्ती और भाईचारे के सामाजिक ढांचे की कोई ईंट सरकती दिखे तो उसकी मरम्मत का इंतजाम सबसे पहले करें, क्योंकि किसी ने एक सवाल बड़ा जबरदस्त किया है—
“देश मिटेगा तो बचेगा कौन?
देश बचेगा तो मिटेगा कौन?”
भौगोलिक रूप से भारत बहुत बड़ा देश है। जलवायु, जाति-धर्म, वर्ग, भाषा, वेषभूषा, खान-पान, रीति-रिवाज, परंपरा, सभ्यता-संस्कृति, शिक्षा और अर्थ के स्तर पर यहां पग-पग पर विविधता है। यह भारत की विशेषता तो है ही, लेकिन साथ ही एक बड़ी चुनौती भी है। इसके अलावा भारत का इतिहास, पड़ोसी देशों की भारत के प्रति नीति और भू-राजनीति के साथ ही देश की अंदरूनी परिस्थितियों के चलते कभी-कभी विभिन्न वर्गों के बीच टकराव की स्थितियां पैदा हो जाती हैं, जिसका इस्तेमाल कर राजनीतिक दल और दबाव समूह अपना उल्लू सीधा करने के लिए भोले-भाले और मासूम लोगों को बहकाकर वातावरण खराब करने का प्रयास करते हैं।
कभी धर्म और आस्था के नाम पर, तो कभी जाति और वर्ग के आधार पर जन-भावना भड़काकर देश में अशांति पैदा कर दी जाती है। जिस वजह से आम आदमी की रोजमर्रा की जीवनशैली प्रभावित होती है। अराजकता के माहौल में जहां सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचता है, वहीं व्यापार-व्यवसाय, उद्योग-धंधे और छोटे-बड़े रोजगार भी प्रभावित होते हैं, जिसका खामियाजा अंततः निर्दोष नागरिकों और उसमें भी विशेषतः निम्न-मध्यमवर्गीय समाज को ही भोगना पड़ता है।
हम इस समय एआई के युग में जी रहे हैं, जहां सूचनाएं बड़ी तेजी से फैलती हैं। स्मार्टफोन और संचार के अन्य अत्याधुनिक माध्यमों से पलक झपकते ही ऐसे फोटो, वीडियो और लिखित कंटेंट की बाढ़ आ जाती है जिसके सच होने की कोई गारंटी नहीं देता। जहां असली और नकली की पहचान करने में कभी-कभी तो विशेषज्ञ भी गच्चा खा जाते हैं।
इसी लूपहोल का फायदा उठाकर असामाजिक तत्वों द्वारा सोशल मीडिया पर झूठी और भ्रामक अफवाहों के माध्यम से अशिक्षित, कम पढ़े-लिखे और भोले-भाले नौजवानों को गुमराह कर उन्हें कानून और व्यवस्था के खिलाफ खड़ा करने का प्रयास किया जाता है, जिसमें वे कभी-कभी सफल भी हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं और इस तरह हमारा वह सामाजिक ताना-बाना नष्ट होने का डर बढ़ जाता है जिस पर हमारी प्रगति और आर्थिक विकास निर्भर है।
यह बहुत जरूरी है कि हम अपने व्यक्तिगत, जातिगत या वर्ग के हित के ऊपर देशहित को रखें क्योंकि हर हाल में देश के भले में ही अपना भी भला है। भारत की बहुसंख्यक आबादी चूंकि युवा है, इसलिए युवा वर्ग की विशेष जिम्मेदारी है कि वह अपने देश के निर्माण में अपना योगदान सुनिश्चित करे। सरदार भगत सिंह, राजगुरु, अशफाक उल्ला खां, वीर अब्दुल हमीद का बलिदान कतई व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।
भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान राष्ट्रतपस्वी वैज्ञानिक स्वर्गीय एपीजे अब्दुल कलाम साहब ने 2047 में भारत को दुनिया का पूर्ण विकसित और सिरमौर देश बनाने का जो सपना खुली आंखों से देखा, उसे पूरा करने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
सरकार एक ओर जहां सरकारी स्कूलों के उन्नयन तथा शिक्षा को रोजगारोन्मुखी बनाने की तैयारी कर रही है, वहीं अब मदरसा प्रणाली का भी कायाकल्प हो रहा है। मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे कुरान और ज्ञान दोनों की शिक्षा एक साथ प्राप्त कर राष्ट्र की मुख्यधारा में जुड़कर देश के जिम्मेदार नागरिक बन सकें, इस दिशा में बहुत सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं।
धारा 370 हटने के बाद कश्मीर में जिस तरह से अमन की बहाली हुई है, उसे देखकर पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) के लोग अब पीओके को फिर से भारत में मिलाने को बेकरार हैं। ‘ऑपरेशन सरपरस्त’ का नेतृत्व कर आतंकियों के मंसूबों को नेस्तनाबूद करने वाली भारत की जांबाज बेटी सोफिया कुरैशी से प्रभावित होकर कश्मीरी लड़कियां अब भारतीय सेना में शामिल होने के लिए बेताब हैं।
भारत को बेहतरी के रास्ते पर ले जाने की बड़ी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी अब आगे आकर नौजवानों को ही संभालनी होगी, क्योंकि पत्थर में से पानी और रेत में से तेल निकालने का यह सामर्थ्य सिर्फ युवा वर्ग में ही है। इसीलिए किसी ने कहा भी है—
“संघर्षों के साए में असली आजादी पलती है।
इतिहास उधर मुड़ जाता है जिस ओर जवानी चलती है।”
तो आइए, हम शपथ लें कि खुद को तिल-तिल मिटाकर भी हम अपने महान देश को न सिर्फ विश्व का अग्रणी राष्ट्र बनाएंगे, बल्कि इसे फिर से ‘विश्वगुरु’ भी बनाएंगे। और यह लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हम आपसी भाईचारे के रास्ते इसे अम्न-ओ-अमान से लबरेज कर देंगे।
– राजेश सयम
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं)









